जीवन में रिश्तों का महत्व | VentAllOut blog

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। जीवन और व्यवस्था को बेहतर करने के लिए मनुष्य ने प्रारंभ से ही बहुत प्रयास किये हैं। इन्ही प्रयासों में समुदाय के रूप में जीवन निर्वहन करना है। मनुष्य ने अपनी बेहतरी के लिए समूह के रूप में जब रहना प्रारम्भ किया तो इसी समूह या समुदाय में जीवन को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए उसने विभिन्न रिश्तों की आधारशिला रखी। लेकिन अब इन रिश्तों में न केवल परिवार और व्यक्तिगत मित्र शामिल हैं, बल्कि वे व्यापक समूह और समुदाय भी हैं जिनसे हम संबंधित हैं।सामाजिक समरसता के लिये रिश्तों का दृढ़ता से निर्वाह करना आवश्यक है। सुख हो या दु:ख दोनों ही परिस्थितियों में रिश्तों का प्रभाव देखा जाता है। कहते हैं कि सुख यदि रिश्तेदारों के साथ मिलकर बांट लिया जाता है तो उसका आनंद दोगुना हो जाता है और दु:ख के समय रिश्तेदारों का साथ हो तो दु:ख आधा रह जाता है। ये रिश्ते रक्त संबंध के तो होते ही हैं, रिश्तों की प्रगाढ़ता पड़ोसियों में भी बन जाती है, रिश्तों का दायरा जब सामाजिक स्तर पर बढ़ता है तो व्यापक हो जाता है। हम सभी जानते हैं कि जब कभी हम रेल, बस में सफर करते हैं तो आपसी वार्तालाप करते—करते अपने प्रेम भरे व्यवहार की नींव आपकी मधुर वाणी, शालीन व्यवहार एवं आपके दृष्टिकोण की पृष्ठभूमि से तैयार होती है। आज से 50 वर्ष पूर्व के सामाजिक वातावरण में जो अपनत्व की गरिमा दिखाई देती थी, उस गरिमा की उष्मा का वर्तमान में अभाव सा है।जीवन में हो रही भागदौड़ से रिश्तों में काभी बदलाव आये हैं। सामाजिकता की रूढ़ पद्धतियां अब आकार बदल रही हैं। बदलाव के इस भागमभाग भरे दौर में जातिबंधन शिथिल होते जा रहे हैं। सामाजिक परम्पराओं को अब रूढ़िवादिता मानकर नजरअंदाज किया जाने लगा है। संयुक्त परिवार की ‘हम’ की भावना अब एकल परिवार में ‘मैं’ में बदल चुकी है।जो की मनुष्य बढ़ते मानसिक दबाव और मनोरोग   का भी कारण बनता रहा है।

 ‘ जुबां में शराफत की पहचान रखना, ना टूटे कोई दिल जरा ध्यान रखना, मुश्किल से मिलते हैं रिश्ते जमीं पर, रिश्तों का नजरों में सम्मान रखना।’

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्धा के इस युग में अपने बालकों को उच्च शिक्षित करने से पहले संस्कारों का पाठ पढ़ायें, जीवन–विकास की धरती में नैतिकता का बीजारोपण करें, वर्तमान माहौल में दृढता से खड़े होने, मुसीबतों से मुकाबला करने, परिस्थितियों पर विजय पाने के लिये हिम्मत का पाठ पढाये।वर्तमान समय में रिश्तो की अहमियत इतनी बदल चुकी है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे अपनी व्यस्तता के कारण हो या अपनी निजी स्वार्थवश रिश्तो को निभाने के बजाए उसे ढो रहे हैं | इंसानियत के रिश्तों को कोई योग्यता और किसी समय कि जरुरत नहीं होती यह तो सिर्फ अपने बुद्धि के स्तर पर रखा जाता है कि आप और हम वाकई में वही( इंसान) है या कोई और, जो इंसान को भी नहीं महत्व दे रहा है आज के इस दौर में?रिश्ते बनाना तो आसान है मगर निभाना मुश्किल है| इसलिए रिश्तो की अहमियत को समझे, अपने इन मीठे रिश्तो के लिए भी वक़्त निकले और अपनों के साथ भी वक़्त बिताएं|अपनों के साथ बिताये वक़्त जो ख़ुशी आपको देगी वो आपको दुनिया में कही न मिलेगा|  आज के इस बदलते परिवेश ने रिश्तो ने की तो मतलब ही बदल डाला है आज कल लोग तो रिश्तो को सिर्फ सोशल मीडिया से ही निभा रहे है|

रिश्तों के ताने-बाने से ही परिवार का निर्माण होता है। कई परिवार मिलकर समाज बनाते हैं और अनेक समाज मधुर रिश्तों की परंपरा को आगे बढाते हुए देश का आगाज करते हैं। सभी रिश्तों का आधार संवेदना होता है, अर्थात सम और वेदना का यानि की सुख-दुख का मिला-जुला रूप जो प्रत्येक मानव को धूप - छाँव की भावनाओं से सराबोर कर देते हैं। रक्त सम्बंधी रिश्ते तो जन्म लेते ही मनुष्य के साथ स्वतः ही जुङ जाते हैं। परन्तु कुछ रिश्ते समय के साथ अपने अस्तित्व का एहसास कराते हैं।  विवेकानंद जी ने कहा है किः- "जीवन में ज्यादा रिश्ते होना जरूरी नही है,  पर जो रिश्ते हैं उनमें जीवन होना जरूरी है।"कोई भी रिश्ता आपसी समझदारी और निःस्वार्थ भावना के साथ परस्पर प्रेम से ही कामयाब होता है। यदि रिश्तों में आपसी सौहार्द न मिटने वाले एहसास की तरह होता है तो, छोटी सी जिंदगी भी लंबी हो जाती है। इंसानियत का रिश्ता यदि खुशहाल होगा तो देश अमन-चैन तथा भाई-चारे से चमक उठेगा। विश्वास और अपनेपन की मिठास से रिश्तों के महत्व को आज भी जीवित रखा जा सकता है। नहीं तो जल्दबाज़ी और नासमझी से हम लोग, सब रिश्ते एक दिन ये सोचकर खो देंगे कि वो मुझे याद नही करते तो मैं क्यों करूं.......................


Posted : a month ago

Mood Board
Language