स्वास्थ्य प्रणाली और भारत की स्थिति | VentAllOut blog

किसी भी देश में स्वास्थ्य प्रणाली की स्थिति उस देश के विकास स्तर को बताती है।बेहतर स्वास्थ्य का अधिकार जनता का पहला बुनियादी अधिकार होता है। स्वस्थ नागरिक ही एक स्वस्थ व विकसित देश के वास्तविक संसाधन होते हैं। भारतीय संस्कृति में तो सदियों से धारणा रही है कि 'पहला सुख निरोगी काया, दूजा 'जान है तो जहान है।' निःसंदेह, अच्छी सेहत ही सबसे बड़ा धन है। सेहत को लेकर कोई भी असावधानी किसी को भी गंभीर बीमारी के करीब ले जा सकती है। इसलिए हर उस चीज से परहेज करना ही उचित है जिससे सेहत को नुक़सान पहुंचाता है या जो हमें बीमारियों का शिकार बनाती है। लेकिन हर समाज या देश को अपने यहां बेहतर और आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली विकसित करनी चाहिए ताकि महामारी या गंभीर परिस्थितियों में देश को चुनौतियों से बाहर निकाला जा सके।

भारत स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बांग्लादेश, चीन, भूटान और श्रीलंका समेत अपने कई पड़ोसी देशों से पीछे हैं। एक शोध एजेंसी 'लैंसेट' ने अपने 'ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज' नामक अध्ययन में किया है। इसके अनुसार, भारत स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्ता व पहुंच के मामले में 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर है। विडंबना है कि सात दशक बाद भी हमारे देश के स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं हो सका है। हमारे देश का संविधान समस्त नागरिकों को जीवन की रक्षा का अधिकार तो देता हैं लेकिन जमीनी हकीकत बिलकुल इसके विपरीत है। हमारे देश में स्वास्थ्य सेवा की ऐसी लचर स्थिति है कि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी व उत्तम सुविधाओं का अभाव होने के कारण मरीजों को अंतिम विकल्प के तौर पर निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हमारे स्वास्थ्य प्रणाली में लगातार सुधार देखने को मिल रहा है।लेकिन अभी भी काफी कुछ करना बाकी है।

हम स्वास्थ्य सेवाओं पर सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी को सबसे कम खर्च करने वाले देशों में शामिल हैं। आंकड़ों के मुताबिक, भारत स्वास्थ्य सेवाओं में जीडीपी का महज़ 1.3 प्रतिशत खर्च करता है, जबकि ब्राजील स्वास्थ्य सेवा पर लगभग 8.3 प्रतिशत, रूस 7.1 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका लगभग 8.8 प्रतिशत खर्च करता है। दक्षेस देशों में, अफगानिस्तान 8.2 प्रतिशत, मालदीव 13.7 प्रतिशत और नेपाल 5.8 प्रतिशत खर्च करता है। भारत स्वास्थ्य सेवाओं पर अपने पड़ोसी देशों चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी कम खर्च करता है। परिवार नियोजन में 2013-14 और 2016-17 में स्वास्थ्य मंत्रालय के कुल बजट का 2 प्रतिशत रहा। सरकार की इसी उदासीनता का फायदा निजी चिकित्सा संस्थान उठा रहे हैं। नेपाल और पाकिस्तान जैसे देशों से भी हम पीछे हैं। जो की एक सशक्त राष्ट्र बनने के हमारे स्वप्न में सबसे बड़ी बाधा है। स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ हो रही हिंसक घटनाएं भी हमारे लिए बड़ी समस्या है।आँकड़े दर्शाते हैं कि डॉक्टर्स को हिंसा का सबसे अधिक खतरा आपातकालीन सेवाएँ प्रदान करते समय ही रहता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इसके अलावा डॉक्टरों, अस्पतालों और उपकरणों की कमी भी हमारे लिए बड़ी समस्या है। देश में 14 लाख से ज्यादा डॉक्टरों की कमी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के आधार पर जहां प्रति एक हजार आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए। वहां भारत में 7 हजार की आबादी पर एक डॉक्टर है। स्वास्थ्य सेवाओं में निजी निवेश 75 प्रतिशत तक बढ़ गया है। इन निजी अस्पतालों का लक्ष्य मुनाफा बटोरना रह गया हैं। भारत जैसे देश में आज भी आर्थिक पिछड़ेपन के लोग शिकार है। वहां चिकित्सा एवं स्वास्थ्य जैसी सेवाओं को निजी हाथों में सौंपना कितना उचित है? एक अध्ययन के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं के महंगे खर्च के कारण भारत में प्रतिवर्ष चार करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। रिसर्च एजेंसी 'अर्न्स्ट एंड यंग' द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 80 फीसदी शहरी और करीब 90 फीसदी ग्रामीण नागरिक अपने सालाना घरेलू खर्च का आधे से अधिक हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च कर देते हैं। 

इन हालातों में भारत में सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करने के लिए स्वास्थ्य सेवा वितरण प्रणाली में बड़े परिवर्तन की जरूरत है। भारत को स्वास्थ्य जैसी बुनियादी व जरूरतमंद सेवाओं के लिए सकल घरेलू उत्पाद की दर में बढ़ोतरी करनी होगी। सरकार को निशुल्क दवाइयों के नाम पर केवल खानापूर्ति करने से बाज आना होगा। साथ ही, यह ध्यान रखना होगा कि एंबुलेंस के अभाव में किसी मरीज को अपने प्राण नहीं गंवाने पड़े।  

भारतीय संविधान जनता के स्वास्थ्य में सुधार को राज्य का प्राथमिक कर्तव्य मानता है। अतः सरकार को स्वास्थ्य प्रणाली सुधारने के लिए जल्द-से-जल्द बड़े कदम उठाने होंगे और जनता को अब अपनी प्राथमिक मांगों में बेहतर स्वास्थ्य को भी शामिल करना होगा।


Posted : a month ago

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