अकेलापन और उम्मीद की ओर देखती दुनिया | VentAllOut blog

आज के दौर में जहाँ एक ओर दुनिया मोबाईल और इंटरनेट के फैले जाल से सिमटकर एक गाँव के रूप में बदल गई है जहाँ दुनिया के किसी देश की एक छोटी सी घटना सम्पूर्ण विश्व के लिए एक वायरल खबर बन जाती है, जहाँ कोई भी व्यक्ति चंद घंटों में दुनिया मे वायरल हो जाता है; वहीं इसी छोटे से फैले इस नये संसार में एक नई समस्या सामने आ रही है और वह है अकेलेपन की समस्या।

संचार के बढ़ते साधनों और सिमटते विश्व के बीच भी अकेलापन वर्तमान जीवन की त्रासदी बनता जा रहा है। निराशाजनक एवं भयावह अकेलापन आधुनिक जीवन की एक बड़ी सच्चाई के रूप में सामने आया है। यह न केवल भारत जैसे विकासशील देशों की समस्या बनता जा रहा है अपितु दुनिया के छोटे-बड़े सभी देश इससे त्रस्त एवं पीड़ित होते जा रहे हैं। यह समस्या इतनी बड़ी होती जा रही है कि इससे निपटने के लिए ब्रिटेन में तो बाकायदा एक मंत्रालय ही गठित कर दिया गया है। इसमें दुनिया के हर जाति, आयु, वर्ग के स्त्री-पुरुष सभी प्रभावित होते जा रहे हैं। अकेलेपन की त्रासदी भोगने वाले इस समूह में सिर्फ वे लोग नहीं हैं जो अकेले रहने को मजबूर है, बल्कि वे लोग भी हैं जो परिवार के साथ रहते हुए, कार्यस्थल या भरेपूरे माहौल में एवं भीड़ के बीच भी खुद को अलग-थलग और अकेला महसूस करते हैं।

भारत में संयुक्त परिवारों के विघटन और एकल परिवारों के चलन ने इस समस्या को और बढ़ावा दिया है। हम कहने को तो युवा देश हैं, लेकिन अपने यहां बुजुर्ग आबादी भी तेजी से बढ़ रही है। यदि आंकड़ों की बात करें तो 60 से 70 आयु वर्ग के लोगों की संख्या इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। लेकिन जो एक नया रीसर्च सामने आया है उसमें यह बात भी सामने आई है कि युवा और बच्चे भी अकेलापन की समस्या से जूझ रहे हैं, हर वर्ष इस समस्या से हारकर कई प्रतिभाशाली व्यक्ति व युवा अपने जीवन का ही अंत कर देते हैं जो किसी भी राष्ट्र के लिए एक बड़ी क्षति है। आज के इस भागमभाग वाले दौर में माता-पिता के पास न तो बच्चों के लिए समय है न खुद के लिए, यह सोचने वाली बात है कि आप बच्चों का भविष्य बनाने के चक्कर मे उनका वर्तमान नष्ट कर रहे हैं।

अनेक हिंसक एवं अनहोनी घटनाएं इसके परिणाम के रूप में सामने आ रही है, जो डराती भी है और कई प्रश्न भी खड़े करती है। अकेलेपन के अपने बनाए दायरे ने परिवार के अंदर भी एक दीवार खड़ी कर दी है। लोगों में संवेदशून्यता तेजी से बढ़ती जा रही है परिणाम नशा, अपराध और मानवता के हनन के रूप में सामने आ रहे हैं।मनोचिकित्सक मानते हैं कि एक बीमार आदमी तन से अधिक मन से बीमार होता है। अकेलापन एक मानसिक बीमारी है। जुगनू तभी तक चमकता है, जब तक उड़ता है। ऐसा ही हाल मन का है। इसलिये मन को कमजोर न होने दें,  अपना नजरियां बदलें, अकेलेपन के अभिशाप को दूर करने का प्रयास करें । समाज एवं सरकार को मिलकर इस समस्या के समाधान हेतु जागरूक होना होगा, तभी इस अकेलेपन को महात्रासदी बनने से रोका जा सकता है।


Posted : 3 months ago

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