कोरोना के दौरान कामकाजी महिलाओं का जीवन | VentAllOut blog

कोरोना के कारण आज लगभग सम्पूर्ण विश्व एक बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है। सम्पूर्ण मानव जाति का जीवन आज अस्त-व्यस्त हो चुका है। लेकिन सबसे ज्यादा मुसीबतों का सामना आज यदि किसी को करना पड़ रहा है तो वे महिलायें हैं। सामन्यतः एशिया महाद्वीप और भारत जैसे देशों में महिलाएं कामकाजी या नौकरी-पेशा वाली नहीं होती क्योंकि लगभग 50 प्रतिशत से ज्यादा महिलाओं के केस में घर वाले नहीं चाहते कि वे नौकरी करें।  यदि कुछ महिलायें नौकरी करती भी हैं तो उन पर घर की भी जिम्मेदारी होती है; अर्थात घर और ऑफिस दोनों की दोहरी जिम्मेदारी। दिनभर ऑफिस और घर के काम करने की वजह से महिलाओं के पास अपने लिए बिल्कुल भी समय नहीं बच रहा है। बगैर किसी मदद के घर के सारे काम करना उनके लिए मुसीबत बनता जा रहा है। जिसके कारण तनाव या एंजाइटी का ख़तरा और केस लगातार बढ़ रहें हैं। 

मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए पहले ही एहतियात के तौर पर सरकार द्वारा पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई थी।ऑफिस न जा पाने के कारण लोग घर से ही अपने सारे ऑफिशल काम निपटा रहे हैं। भारत में कोरोना वायरस लॉकडाउन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि महिलाओं के लिए इस दौरान काम का बोझ हल्का होने की बजाए दोगुना हो चुका है। यही वजह है कि यह लॉकडाउन पीरियड कामकाजी महिलाओं के लिए मुसीबत का कारण  बनता जा रहा है। दरअसल, इस लॉकडाउन के कारण नौकरी-पेशा महिलाएं जहां एक ओर वर्क फ्रॉम होम करते हुए 9-10 घंटे ऑफिशल काम कर रही हैं तो वहीं बचे हुए समय में उन्हें घर व परिवार का भी पूरा ध्यान रखना पड़ रहा है। यह स्थिति उन्हें हर दिन फिजिकली और मेंटली रूप से ज्यादा थका रही है। एक सर्वे के अनुसार अभी तीन में से एक महिला पूरे समय बच्चों की देखभाल कर रही है। वहीं सिर्फ पांच में से एक यानी 17 प्रतिशत पुरुष ही पूरे समय बच्चों की देखभाल रहे हैं। सर्वे में कहा गया है कि पांच में से दो यानी 44 प्रतिशत महिलाओं को अपने बच्चों की देखभाल के लिए कार्य के घंटों से आगे भी काम करना पड़ रहा है, वहीं 25 प्रतिशत पुरुषों को ऐसा करना पड़ रहा है। सर्वे के अनुसार, पांच में से सिर्फ एक यानी 20 प्रतिशत महिलाएं ही अपने बच्चों की देखभाल के लिए परिवार के सदस्यों या मित्रों पर निर्भर हैं। लगभग 50 प्रतिशत महिलाओं पर मानसिक बीमारियों का ख़तरा बढ़ चुका है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर एक महिला रोजाना लगभग छह घंटे से आठ घंटे अनपेड वर्क यानी घर का काम करती है जिसका उसे कोई आर्थिक भुगतान नहीं किया जाता। इन परिस्थितियों के कारण जहाँ समाज में एक ओर लिंग भेद की समस्याएं बढ़ रहीं हैं, वहीँ दूसरी ओर सामाज का एक महत्वपूर्ण अंग तनाव की बिमारी से पीड़ित होता चला जाएगा। और एक बेहतर समाज का सपना हमसे लगातार दूर होता जाएगा। समय रहते अपने घर की महिलाओं की मदद और काम में उनका हाथ बाँटना हमें सीखना होगा ताकि बेहतर बन सके ये सारा जहाँ।


Posted : 3 weeks ago

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