बेहतर स्वास्थ्य के लिए मेंटल स्थिति का बेहतर होना आवश्यक है

हम बेहतर निर्णय तब ले पाते हैं जब हमारा मानसिक स्वास्थ्य बेहतर हो। यदि आप मेंटली फिट हैं तो जीवन में आने वाली समस्याओं को आसानी से सुलझा सकते हैं। यदि आप मेंटली फिट हैं तो जीवन में आने वाली समस्याओं को आसानी व बेहतर तरीके से सुलझा सकते हैं।यदि आप मेंटली फिट हैं तो जीवन में आने वाली समस्याओं को आसानी से सुलझा सकते हैं, अपने स्वास्थ्य संबंधी उचित निर्णय ले सकते हैं। आजकल भागदौड़ वाली लाइफस्टाइल में स्ट्रेस होना एक आम बात है। ऐसे में खुद को मेंटली फिट रखना भी एक चैलेंज होता है। हम अपने स्वस्थ दिमाग के चलते ही जीवन में होने वाली समस्याओं का सामना कर सकते हैं। इसके अलावा तरक्की के पड़ाव पर पहुंचने के लिए भी स्वस्थ दिमाग की आवश्यकता होती है। इस समय जब सम्पूर्ण विश्व कोविद-19 की मार को झेल रहा है ऐसे में सर्वे व स्वास्थ्य संगठन बता रहें हैं कि लोगों की मानसिक स्थिति काफी प्रभावित हुई है। ऐसे में जरूरी है कि हम अपने मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का प्रयास करें। ख़राब मेंटल प्रॉब्लम से जूझ रहे लोगों के कुछ सामान्य लक्षण इस प्रकार हैं, जैसे- लोगों से अलग-थलग रहना अकेले रहना, कामकाज में असामान्यता विशेष रूप से स्कूल या ऑफिस में, खेल या किसी भी गतिविधि में अरुचि, एकाग्रता में समस्या, याददाश्त क्षमता में कमी या कुछ समझने में मुश्किल होना, उदास रहना आदि लक्षण हो सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ दिमाग रहता है। स्वस्थ शरीर रखने के लिए आपको अपने सेहत का ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए आप हेल्दी भोजन का सेवन करें और खूब पानी पिएं। इसके अलावा व्यायाम करें और पूरी नींद लें। खासकर धूम्रपान से दूरी बनाकर रखें।  यदि मेंटल प्रॉब्लम से पीड़ित व्यक्ति आप से कोई बात या फीलिंग बताता है, तो उसको ध्यान से सुनें। वो कैसा महसूस करता है? यह सुनना वास्तव में कारगर हो सकता है। उन्हें फील कराएं कि उनको जब भी जरूरत है, आप उनके साथ हैं। हालांकि अपने तनाव की वजहों को रोकना तो हर किसी के बस में नहीं होता है। लेकिन उन वजहों से खुद को कम से कम परेशान करना आप पर जरूर निर्भर करता है, जिसके लिए सबसे पहले आपको यह बात समझने की जरूरत है कि आप अपने जीवन में किस चीज को कितनी अहमियत देते हो, या कोई चीज आपको कितना ज्यादा इफेक्ट कर सकती है। एक नए शोध के अनुसार हफ्ते में कम से कम 3 बार एक्सरसाइज करने से मानसिक तनाव 19 फीसदी तक कम होता है. शोधकर्ताओं की मानें तो एक्सरसाइज करने वालों को कम तनाव होता है, जबकि बहुत तनाव में रहने वाले लोग वो होते हैं जो एक्सरसाइज ही नहीं करते। चूँकि एक बेहतर स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति की चाहत हर इंसान में होती है लेकिन उसके लिए जरूरी है कि हम अपनी मानसिक स्थिति को पहले बेहतर व मजबूत बनाने का प्रयास करें। लोगों से मिलें यदि जरूरी हो तो किसी एक्सपर्ट या मनोचिकित्सक की भी सहायता भी ले सकते हैं।

2 weeks ago

A Word About Emotional Intelligence: How to improve your EQ?

We all are working with two sides of the brain- one that feels and the other that thinks. And to confront the elephant in the room- Which one is more important? Let’s just say, both have important roles to play but Emotional Quotient gains more points over Intelligence Quotient. The only reason being that you can score high on IQ if you’ve access to a great source of knowledge and cultivating mental abilities but a high EQ comes more naturally and requires years of nurturing and strengthening of the little voice inside called intuition. Let’s read more about it! What is Emotional Quotient? Man is a social being. The journey of our ancestors began when man developed a sense of emotional control and expression as they practised perceiving feelings based on situations. You must have met or you may be the person in your group who is known to be a good listener. Good listeners don’t only hear out the problem when you need to vent to someone but they know what to say that could lift your load off. You might not end up with a solution after a conversation but you end up feeling good, optimistic or light-hearted. With people having a great intuitive listening and control over their emotions are said to have a higher Emotional Quotient. How does high EQ help you? The benefits of having better emotional intelligence are: 1. You are self-aware You don’t rely on external factors to lead your life rather you enjoy making decisions. You don’t compromise on things that bring you negative emotions. You just vent out in the most “non-harming” way possible. 2. You are empathetic You do, think and feel keeping empathy as your guide. People around you, personal or professional, will feel comforted and welcomed every time. You gain the trust of people by being yourself. Empaths enjoy a great social life. When life or situations overwhelm them, they prefer to vent anonymously or confide in the closest person. 3. You have great social skills If you have the support of people in your workforce or home, you will enjoy success in all spheres of life. That comes with having social skills that please folks around you. How to improve EQ score? Here are some ways to ensure you are nurturing your emotional intelligence: 1. Optimistic Communication You don’t necessarily have to agree with others to impress them. It is how you put your opinion forward without belittling the other person. If you’re conscious of keeping their emotions on top, you’ll always end up discussing in an assertive manner without compromising your integrity. 2. Be Open for Conversation Be welcoming to people as much as you can. Adorn a positive attitude towards life so that you attain a reputation as easy to approach and fun to talk with a friend. In fact, when you listen to people’s problems, you view life from their lens and learn the lessons they learnt through their struggles. 3. Use Leadership Skills Wisely A good leader is the one that empathises but also presents decision making in tough situations. Taking opinions from your teammates will widen your understanding. However, in times of conflict within the team, you should be able to take a stand and add value to it by convincing the lot. 4. Keep Yourself Burden Free It’s practically difficult to stay wary of stress from daily life. But if you can take out a few minutes from each day to relax your worried nerves, it’ll help you stay aware of your needs. For example, you must try websites to vent to strangers like Ventallout for releasing the negative energies and turning them into constructive energies. The conclusion: Emotional intelligence needs time and conscious attempts to reflect in your personalities. Allow the growth within you. It’s a project that goes on. Keep learning, every day.

2 weeks ago

नींद की समस्या और बढ़ता खतरा

अभी तक कम नींद आना या नींद समय पर न आना कोई बड़ी समस्या नहीं मानी जाती थी। लेकिन वर्तमान रिसर्च और प्रयोगों में माना गया कि अभी तक कम नींद आना या नींद समय पर न आना एक समस्या है, जो धीरे-धीरे कई रोगों का कारण भी बन जाती है। कभी-कभी यह इतना खतरनाक हो जाता है कि व्यक्ति तनाव का भी शिकार हो जाता है। लेकिन ज्यादातर लोग कभी न कभी नींद आने मे परेशानी का सामना करते है। हम सब ने एक शब्द सुना होगा - अनिद्रा (Insomnia), अगर आप बहुत चिन्तित हों या बहुत उत्तेजित हों तो थोड़े समय के लिए आप इसके शिकार हो सकते हो और जब आपकी उत्तेजना या चिन्ता खत्म हो जाती है तो सब सामान्य हो जाता है| अगर आपको अच्छी नींद  नही आती है तो ये एक समस्या है क्योंकि नींद आपके शरीर और दिमाग को स्वस्थ एवं चुस्त रखती है। इस बिमारी से ज्यादातर युवा वर्ग पीड़ित है। आज के समय में जहां काम का बोझ बढ़ता जा रहा है और प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ रही ऐसे में सबसे फिटेस्ट व्यक्ति ही सभी चुनौतियों को पीछे छोड़ आरामदायक जीवन को प्राप्त कर सकता है। जिसके लिए पहली शर्त अच्छी नींद है जिसके लिए एक बड़ा वर्ग संघर्षरत है।   बदलती जीवनशैली में कई बार तनाव, चिंता, सोने से पहले की गलत आदतें आदि कारणों से कुछ लोगों को अनिद्रा की समस्या होती है। किसी को जल्दी नींद नहीं आ पाती, किसी को गहरी नींद नहीं आती तो किसी को पूरी रात नींद नहीं आ पाती है। यह एक रोचक तथ्य है कि लगभग 33 प्रतिशत सड़क हादसे पर्याप्त नींद न लेने के कारण होती है। नींद लेना वह प्रक्रिया है जो किसी भी मनुष्य को संतुष्ट कर सकती है और उसके दिमाग को फ्रेश करके आगे के कार्यों के लिए तैयार करती है। यदि जरूरत पड़ने पर आपको अच्छी नींद आती है और सोने में कोई दिक्कत नहीं होती तो यकीनन आप दुनिया के कुछ भाग्यशाली लोगों में से हैं। यह भी दिलचस्प है कि आज एक बड़ी आबादी नींद की किसी-न-किसी समस्या से जूझ रहा है। सामन्यतः यह बिमारी दो तरह की होती है-पहली,अनिद्रा या इनसोमनिया। और दूसरी,हाइपरसोमनिया या अतिनिद्रा। एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए 7-8 घंटे की नींद अच्छी मानी गई है लेकिन यदि आप इससे अधिक या कम नींद लेते हैं तो आपको सायकोलॉजिस्ट से सहायता लेने की जरूरत है।  रोजाना रात को सोने से पहले हाथ-मुंह और पैरों को धोएं। ऐसा करने से अच्छी नींद लगने में मदद मिलती है। दिन में या रात में जब भी सोना हो, तो उस समय से पहले चाय या कॉफी का सेवन न करें। सोने से पहले तलवों पर सरसों के तेल से मालिश करने से भी दिमाग शांत और स्थिर रहता है, रक्त संचार बेहतर होने के साथ ही थकान दूर होती है, जिससे नींद अच्छी आती है। रात को सोने से पहले दूध में एक चुटकी जायफल मिलाकर पीएं। ये भी अच्छी नींद लाने में मदद करता है। सांस लेने की इस ट्रिक को भी आप आजमा सकते है, इसके लिए आपको नाक से चार सकेंड तक के लिए सांस लेना है, फिर सात सकेंड तक इसे रोक कर रखें और आठ सकेंड तक इसे छोड़ते रहे। ऐसा करने से हार्ट बीट धीमी होती है और ब्रेन में एक केमिकल रिलीज होता है, जो कि अच्छी नींद लाने में सहायक होता है।

3 weeks ago

Fighting Addiction: Simple Ways to Get Rid of Years of Addiction

People struggling with addiction are always under the radar of falling back to old habits. When asked, “How did it start?”, the person would find it hard to describe their experience. That’s how confusing falling into addiction is! If you’re simply curious or dealing with someone or yourself with some kind of addiction, this article is a fresh perspective on the topic- Fighting Addiction. To quit an addicting habit which has evolved over the years requires quite some steps which are broadly defined as: 1. Knowing Your Tolerance Levels The beginning of any kind of addiction involves undermining your permissible limits. You tend to hold the thought of being in control and even before you realise, you are addicted. It occurs faster if it’s substance abuse. 2. Understanding Your Withdrawal Symptoms Once you’ve been acquitted of being addicted then you’re most likely to work on them. And it’s going to be the most difficult phase. The withdrawal brings you a lot of physical and psychological effects. The absence of ‘feel-good’ hormones will startle you with constant irritation, improper sleeping and eating patterns, anxiety attacks, body shivers, fever or stomach upset. Look out for your symptoms and probably, write about them on a venting website to stay self-aware. 3. Put Coping Strategy in Place Before Quitting It is extremely important to stay away from making big promises or to enter extremities. All you need is a plan to work on. Steady progress, no matter how small they seem, will add to your final goal. Have your partner, family and psychiatrist on your team. Let them control your medication if you’re prescribed for. Also, have them accompany you for a run to a park, to meditation and yoga centre or become your ear to just vent your feelings. 4. Deal with Guilt & Avoid Justification You know something is wrong with you and you need to fix it. For the patient of depression or addiction, it is easy to fall into the thought process of being a dependent or a burden on their loved ones. This is where the problem begins and you need to stay very far away from it. Keep the feeling of guilt under control. This could potentially harm your progress by putting you in a back gear. You can lose the focus easily. The truth is, people who stand by you realise the number of efforts you’re putting in to fight the demons. They truly adore and get inspired by your feat every single day. It’s about choosing the perspective in life. “When you can’t believe in the good in you, do yourself a favour by listening to what your loved ones are telling you every day. Borrow their glasses to view yourself and maybe you’ll fall in love with yourself.” Also, on the other hand, you need to stop justifying yourself as to why you deserve to flow the abusive relationship with yourself. You are special. You are important to many in your life. There’s always at least one person looking up to you. What do you take with yourself today? Addiction isn’t a choice you make. It is the many-many choices you made which made you sick today. It’s okay to be treated like a patient. Accept the reality and wake towards a brighter future. If this article resonates with you, don’t forget to share and log into Ventallout for a relieving session of venting online.

3 weeks ago

डिमेंशिया: एक मानसिक बीमारी

हाल के एक रिसर्च से पता चला है कि दुनिया में लगभग 50 मिलियन ऐसे लोग हैं जो डिमेंशिया की समस्या से ग्रसित हैं। किसी भी बीमारी की एक निश्चित संख्या का पता हो तो उसे रोकना थोड़ा आसान होता है। लेकिन यहां बड़ी समस्या यह है कि डिमेंशिया के 10 मिलियन रोगी हर साल बढ़ रहें हैं। ऐसे में इस बीमारी की वास्तविक गंभीरता का पता चलता है। इस बीमारी को इस तरह से समझें कि यह कोई बीमारी न होकर मानसिक क्षमता में कमी या कमज़ोरी है। यह एक तरह का सिंड्रोम है अर्थात एक रोग में कई लक्षणों का एक साथ होना। कई लोग डिमेंशिया को ही यादाश्त क्षमता कमी में आई कमी मान लेते हैं। यद्पि कुछ लोग मीमोरी लॉस की बीमारी से ग्रस्त होते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनको अल्जाइमर या डिमेंशिया बीमारी है, मीमोरी लॉस होने के कई कारण हो सकते हैं, कभी-कभी अच्छी नींद न लेना भी आगे आने वाले समय मीमोरी लॉस की समस्या का कारण बन सकता है।  डिमेंशिया के सामान्य लक्षणों में - स्मरण शक्ति की क्षति का होना, ज़रूरी चीज़ें भूल जाना, सोचने में कठिनाई होना, छोटी-छोटी समस्याओं को भी न सुलझा पाना, रास्ता भटक जाना, व्यक्तित्व में बदलाव, किसी वस्तु का चित्र देखकर यह न समझ पाना कि यह क्या है, नंबर जोड़ने और घटाने में दिक्कत, गिनती करने में परेशानी। यह बीमारी तब ज्यादा गंभीर हो जाती है जब व्यक्ति अपने छोटे-छोटे कार्यों के लिए भी दूसरों पर निर्भर हो जाता है। जब मस्तिष्क कोशिकाएं किसी कारण से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं तब डिमेंशिया हो सकता है। इसके कारण मस्तिष्क कोशिकाओं की एक दूसरे के साथ संवाद या कनेक्ट करने की क्षमता पर असर पड़ता है जिससे पीड़ित व्यक्ति की सोच, व्यवहार और भावनाओं पर भी असर होता है। इसको ऐसे भी समझा जा सकता है: हम जानते हैं कि मस्तिष्क के अलग-अलग भाग होते हैं और प्रत्येक भाग  भिन्न-भिन्न कार्य करते हैं। डिमेंशिया सिर की चोट, स्ट्रोक, मस्तिष्क ट्यूमर या एचआईवी संक्रमण के कारण भी हो सकता है।  डिमेंशिया के कई प्रकार होते हैं जिनमें, डिमेंशिया का सबसे आम प्रकार अल्जाइमर रोग है। लेवी बॉडीज डिमेंशिया; यह डिमेंशिया का एक रूप है जो कोर्टेक्स में प्रोटीन के एकत्र होने के कारण होता है। याददाश्त में कमी और भ्रम इसके बड़े लक्षण हैं। इस रोग से हर 4-5 सेकंड में कोई-न-कोई व्यक्ति पीड़ित हो जाता है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस बीमारी कोई भी इलाज संभव नहीं है ।सिर पर चोट लगना,, मस्तिष्क में ट्यूमर, संक्रमण, हार्मोन विकार जैसे थायरॉइड रोग, हाइपोक्सिया (खून में खराब ऑक्सीजन), मेटाबोलिक संबंधी विकार, नशे की लत आदि डिमेंशिया ने कुछ ऐसे कारण है जिससे इस रोग के होने का जिखिम बढ़ सकता है। अतः इस बीमारी पर लोगों की जागरूकता बढ़ा कर, बढ़ती उम्र के साथ योग-व्यायाम की सहायता लेकर इस बीमारी से बचा जा सकता है और यदि समस्या बढ़ती जाए तो किसी विशेषज्ञ  से मिलकर उसे जल्द-से-जल्द दूर करने का प्रयास करना चाहिए। प्रयास करें अपनी दिनचर्या में सुधार करें, अच्छी या जरूरी नींद अवश्य लें।

4 weeks ago

Dealing with creative block? Here are 4 steps to keep it going…

“Creativity is soul-nourishing.” That’s the only reason why artists, writers, singers, musicians, painters, designers and other creative “-ers” choose against conventional jobs. But is this the complete story? As a creative person, you are bound to feel empty. There are going to be times when you don’t feel inspired to practice your art. All you need is a place to vent and release the blocked energies so you can get back to your usual self. But is it possible to make the process easier and faster? Here’s what the industry experts’ think you must do: 1. Know when to speak Most of the time, when you’re excited or overwhelmed with an idea, you want to talk about it. That’s the biggest ‘No-No’! You must never speak of an idea until you’ve made some significant progress and it can’t be kept under the rugs. The reason being, when you talk about your art, you imagine it happening. The more you talk about it, the more you feel closer to its end. Sooner, you’ll realise that the words said have now burdened you as there’s no way out. You feel tragically suppressed to complete it rather than enjoying the work. Stay mum until necessary to speak! 2. Routine is important Creative tasks are as redundant as any other 9-to-5 job. Yes, this is the truth. Don’t try to fight it because you need the patience, time, efforts, consistency and all those A-listed corporate ethics to give 100% of you to a job. However, the difference is that you don’t have to feel out of the place. Enjoy a routine based on your creative juices. The fact is you have to commit to a timeline and that’s it. For the times when you feel low, vent online or to your friends. 3. Take a break It’s false to feel guilty about not being able to produce the required or desired work sometimes. Creativity is like a fuel which absolutely needs to be refuelled. The biggest troublemaker is professional demands. Let your clients know about a much-required break or delegate the tasks to your subordinates when you feel less inspired. It depends on you for how long it takes to recharge your mind and body. Some people enjoy a 2-day vacation and some need 2 months to actually come back to life. Don’t pressure yourself to keep going when clearly your mind, body and soul need you to simply take a break. 4. Follow a Venting Cycle Having a functional and tiring day might drain your energies to speak with people or invest time in meaningful conversations at the end of the day. But this could lead to bottling up the feelings. Ventallout is the anonymous venting website and spending a few minutes will release your frustration, agony, sadness or any other negative feeling that might be in your way to a happy working time. So what do you think of these amazing core steps to keep your creative tyre rolling? We’re sure these proven ways will help you just like these have helped us so many times. Get back to us with your views and let us know the changes you experienced. Also, don’t forget to share these effective ways with your mates.

4 weeks ago

कोरोना से प्रभावित होती याददाश्त क्षमता 

कोरोना अर्थात Covid-19 से जब दुनिया तेजी से प्रभावित होना शुरू हुई तो सोशल-डिस्टन्सिग, मास्क आदि उपाय खोज कर Covid-19 की रफ़्तार को कम किया गया। फिर विश्व के बड़े देशों ने अपने-यहाँ लॉक-डाउन का सहारा लिया। जिसके तहत लोगों को उनके घर में ही रहने की सलाह दी गई। जो भारतीय रेल कभी युद्ध की भयंकर स्थितियों में नही रोकी गयी,आज उसकी गति पर भी विराम लगा दिया गया है। इससे आप स्थिति कितनी ख़राब है इसका अंदाजा लगा सकते हैं। लेकिन इस लॉकडाउन के बीच कुछ ख़बरें ऐसी आ रहीं हैं जिनसे मनुष्य के खराब होते मानसिक स्वास्थ्य के बारे में पता चलता है, जो कि चिंता का विषय है। इतने समय तक तमाम मिडिया चैनलों केवल-और-केवल कोरोना की खबरें ही चल रहीं हैं; कभी कहीं से एक दिन में लाखों लोगों के प्रभावित होने की ख़बर आती है तो कभी एक ही दिन में हजारों लोगों के मरने की ख़बर। कुछ ऐसी भी घटनाएं सुनने को मिलीं जहां कुछ लोगों ने अपने हल्के खांसी-जुकाम को कोरोना समझकर आत्महत्या कर ली। इन सभी घटनाओं का परिणाम यह हुआ कि मानव मस्तिष्क अपने सभी सपनों, लक्ष्य, काम आदि को छोड़कर लगातार एक ड़र वातावरण में जीने लगा। कोरोना से लड़कर वापस आम जिंदगी में आने वाले लोगों को तवज्जो देने के स्थान पर मानवीय मस्तिष्क ने भय, नाउम्मीदी और अतार्किकता को महत्व दिया । जिसका परिणाम यह हुआ कि कोरोना से प्रभावित होकर वापस ठीक होने वाले तथा अप्रभावित दोनों की याद्दाश्त क्षमता प्रभावित होने लगी। डॉक्टरों का मानना है कि जो लोग कोरोना से ठीक हो रहें हैं उनमें पोस्ट कोविड सिम्पटम दिखाई देने लगे हैं, जिसमें याद्दाश्त क्षमता का कमजोर होना सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है। राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के डॉक्टर बताते हैं कि पोस्ट कोविड क्लीनिक में इलाज कराने आए 250 लोगों मे से 80 लोगों में न्यूरो समस्याएं देखने को मिली हैं। इनमें करीब 20 फ़ीसदी लोग ऐसे हैं जिन्हें भूलने की समस्या हो रही है। यदि डब्ल्यूएचओ की मानें तो जब कोई कोविड-19 से उबर रहा होगा तो तब यह समस्याएं कुछ हफ्तों या महीनों में अपने आप दूर हो जाएंगे, लेकिन कुछ लोगों में यह लक्षण ज्यादा वक्त तक भी रहे सकते हैं। तब ऐसे में उम्मीद न खोएं। अपने को व्यस्त रखें,नकारात्मक विचार मन मे न आने दें।अपने दिमाग को चिंता व तनाव से दूर रखने तथा इस भय और लॉकडाउन की कष्टदायी घड़ी को बिताने के लिये अपनी हॉबी पर काम कर सकते हैं। इससे आपमे जीवन के प्रति उत्साह भी जागृत होगा तो साथ ही इस विपत्ति की घड़ी से उबरने का साहस भी मिलेगा। हमेशा याद रखिये हर विपत्ति का अंत होता ही है तो इसका भी अंत होगा। आने वाली सुनहरी सुबह का इंतजार करिये और हिम्मत कभी मत हारिये। सकारात्मक ऊर्जा और जुझारूपन ही हमें इस संकट की घड़ी से उबार सकता है। यादाश्त क्षमता को बढाने के उपायों पर कार्य कीजिये हो सके तो व्यायाम और मेंटल एक्सर्साइज का भी सहारा लीजिये। और जब लगने लगे कि परिस्थितियां हाथ से बाहर निकल रही हैं तो किसी मनोचिकित्सक की भी सहायता लीजिये।  

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