तलाक़: एक विफल वैवाहिक संबंध का हल नहीं हो सकता- Relationship Family
@Dhirendra
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 शादी के साथ ही इंसान के जीवन में लगभग बहुत कुछ बदल जाता है; चाहे वो उसकी निजी जिंदगी हो या फिर सामाजिक। लेकिन धीरे -धीरे यह नयी शुरुआत पुरानी होने लगती है, फिर होता यूँ है कि हमें अपनी सामान्य सी आने वाली अड़चनों तथा अन्य उतार-चढ़ाव की सारी वजहें अपने निजी संबंधों में दिखाई देने लगतें हैं और हम अपने साथी के साथ आरोप-प्रत्यारोप की प्रक्रिया से गुज़रने लगते हैं। प्रारंभ में एक-दूसरे की छोटी-छोटी गलतियों को नजरअंदाज करने के बाद धीरे-धीरे हम गलतियां खोजने में ही लग जाते हैं। फिर यह प्रक्रिया इतनी बोझिल हो जाती है कि हम अपने शुरुआती जीवन के,दोस्तों की खोज में निकल जाते हैं और जिसका जीवन भर साथ निभाने की कसम लेते हैं उसका अस्तित्व अपने जीवन से मिटाने के प्रयास में लग जाते हैं। अब बातें कम बहसें ज्यादा होने लगती हैं। तदुपरान्त क्या गलत है और क्या सही है कि वजाय कौन सही और कौन गलत है; इस जदोजहद में लग जाते हैं। हम नए विकल्पों को खंगालने लगते हैं और उन सब विकल्पों में से जो हमारे सामने सबसे सरल होकर निकलता है; वो होता है 'तलाक'। हम मन-ही-मन ये मान लेते हैं कि तलाक के अलावा अब हमारे पास और कोई विकल्प नहीं बचा है।

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